निंदा न करना

आप ईमानदारी से देखिए , अपने मन में झांकिए और पूछिए अपने आप से कि क्या आप दूसरे के कृत्यों में , क्या आप दूसरों के जीवन में रूकावट डालते हैं ?

निंदा करने का अर्थ यह है तुम्हारी दृष्टि अपने - आप पर नहीं , दूसरों पर है । तुम्हारे जीवन में जब कुछ करने को नहीं , तो खाली हो , इसलिए दूसरों कि जिंदगी में ताक - झांक करते फिरते हो । तुम्हें दूसरों से क्या लेना - देना , अपने अन्दर कि तृष्णा को , पीड़ा को मिटाओ । तुम अपने कृष्ण को कहो कि मेरे अंतर में साँची लगन लगा , ताकि मैं अपनी जिंदगी सुधारूं । मैं दूसरों की जिंदगी में दखलअंदाजी करूँ ही क्यों ? आप ईमानदारी से देखिए , अपने मन में झांकिए और पूछिए अपने आप से , कि क्या आप दूसरे के कृत्यों में , क्या आप दूसरों के जीवन में रूकावट डालते हैं ? माना किसी ने ग़लत किया , जिसने किया , वो भुगतेगा , तुम काहे को चिंतित हो रहे हो ।

बुद्ध कहते हैं कि साधु कौन ? जो दूसरों कि निंदा करे

आदमी को जितना मजा निंदा करके आता है , शायद और किसी चीज़ में नहीं आता । बिना तथ्य को जाने , बिना तथ्य को समझे , बिना सच्चाई को जाने , सुनी - सुने बात , अथवा अपने मन कि कल्पना , अथवा मन के अनुमान जोड़ कर किसी के विषय में अहितकारी बात सोचना , यह है निंदा ।

कोई कहता कि फलां ऐसा है , वह ऐसा है , और कान कितने बड़े करके सुनते हैं कि अच्छा और , अच्छा और ............। अब हमने सुनी , तो हम हजम नहीं करेंगे , हम यही बात किसी दूसरे को सुनायेंगे । जब दूसरे को सुनायेंगे , तो क्या बातें और जोड़ देंगे । जिसको तुम सुनाओगे , वह भी आगे सुनाएगा । जैसे
" किसी की पीठ पीछे निंदा करना , वमन करने जैसा है । "

तुम बिमारी पचा नहीं पाए , उसका भी हाजमां ख़राब , वह भी किसी और पर उल्टी करेगा ।

किसी की पीठ पीछे निंदा करना वमन करने जैसे है । मान तो आप पहाड़ जाने के जिस बस में सफर कर रहे हो , कईयों को तो मैदानी इलाके में ही बस का सफ़र करते ही उलटी आनी शुरू हो जाती है । बस में आपके बगल में कोई बैठा हो और उसका जी मिचलाने लगे , उल्टी होने लगे , तो बस की सीट इतनी बड़ी होती नहीं की तुम खिसक जाओ , और उसका जी मिचलाने लगे , उल्टी होने लगे , तो बस की सीट इतनी बड़ी होती नहीं की तुम खिसक जाओ , और उसने मुहं खोला , और भड़ाक .........., करके तुम्हारी गोद में कर दिया सारा काम , मजा आया ? तुम कहोगे की अरे , सारे कपड़े हामरे खराब कर दिए , इसमें मजा क्या आया ? तुम कहोगे कि अरे , सारे कपड़े हमारे ख़राब कर दिए , इसमें मजा क्या आया ? अब वह उल्टी आपकी गोद में तो नहीं करना चाहता होगा , जन तो खिड़की कि तरफ़ चाहता होगा , जाना तो खिड़की कि तरफ़ चाहता है , पर बीच में आप बैठे हो , उसके पास इतना वक्त नहीं कि वह खिड़की तक पहुँच पाए , और आपकी गोद में कर दी , तो आपको ख़राब लगेगा , गुस्सा भी आएगा कि जी मिचलाता है , तो बस में सफ़र ही क्यों करते हैं । गोली क्यों नहीं खा लेते ? दस उपदेश देने लग जाओगे ।

जब दूसरे की , की गई उल्टी तुम्हें बर्दाश्त नहीं होती है , तो जब कोई आकर दूसरे के बुरे की उल्टी तुम्हारे ऊपर करता है , तब तुम कैसे मजे से खाते हो उसको ? सिर्फ़ डलवाई ही नहीं गोद में , खा भी जाते हो ।

कितनी जल्दी से हम दूसरों की बुरे करने में मजा लेते हैं । मालूम क्यों करते हैं ? इसलिए करते हैं की दूसरे की बुराई करते - करते - करते परोक्ष में अपने आपको अच्छा कह रहे हैं । मेरे आसपास जितने हैं , में सबकी बुराई करूँ कि ' इसमें यह बुराई है ' , ' इसमे यह बुराई है ' , पर आप कहोगे कि अपनी बात तो बोलते नहीं ।

निंदा करने वालों को रस नंदन करने में नहीं है , दूसरे को ख़राब दिखाकर अपने आपको अच्छा दिखा सको , यह रस है । पर यह बड़ी नीच मानसिकता है ! खाली सत्संग सुना , ध्यान लगाया , इतने में थोड़ा तुम साधक हो जाओगे । मन के इन सूक्ष्म खेलों को समझना व इनसे छूटना आवश्यक है ।

एक सूत्र सत्यता के बोध में ही वैराग्य घटता है


ममता को दूर करने के इलाज हैं दो । एक - वैराग्य । संसार ही असत्यता पर चिन्तन करें कि ' जगत मरणहारा है , यहाँ सदा कुछ नहीं रहेगा , जो है सो बदल जाएगा , जो बदल जाएगा उसका क्या ठीकाना ! '

संसार कि असारता पर चिन्तन करें । इसी एक बात का , संसार कि असारता का , संसार की अनित्यता का चिन्तन सतत भीतर चले । यह एक ही बात याद में गहरी उतरे कि कुछ भी यहाँ सदा टिकने वाला है नहीं । यहाँ कुछ भी नित्य , सदा रहने वाला नहीं । सबकुछ बदल जाएगा । सबकुछ परिवर्तित होता रहेगा ।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है । हर चीज़ बदलेगी , बदलनी ही है । तो जो बदल ही जाना है उससे दोस्ती क्या ! अपने बेगाने हो जाए , तो फिकर मत करना । अपनों का पराया हो जाना यह हकीक़त है । दादास जुटाओ और जीवन के इस कठोर सत्य का सामना करो ।

मित्र हमेशा नहीं बना रहेगा । मित्रता ने दुश्मनी बदलना ही है , क्योंकि परिवर्तन इस संसार का नियम हैं । इस संसार का नियम ही है कि यह परिवर्तित होता रहता है । तो अपने मन को ममता से बाहर निकालने का एक तरीका है ; वैराग्य ।

ऋषि अमृत अक्टूबर २००७

क्या आप चुप हैं?

जेन फकीर बोकॉजू का एक नया-नया भिक्षु शिष्य उसके पास बैठा हुआ था, और मौन था। ज़ेन फकीर बोकॉजू अपने पास एक डंडा रखते थे। शिष्य मौन बैठा था। शिष्य ध्यान कर रहा था, और ज़ेन फकीर बोकॉजू ने उठाया डंडा और बड़ी ज़ोर से उसकी पीठ पर मारा और कहा - 'चुप करके बैठ'। शिष्य ने कहा , 'गुरुदेव! चुप तो हूँ ' । गुरु ने एक और डंडा ठोक दिया और बोले - 'तू झूठ बोल रहा है, क्या तू चुप था ? 'अब शिष्य सोच में पड़ गया । जीभ चुप थी ; मौन थी ज़ुबान, पर मन बोल रहा था।

ऋषि अमृत : अगस्त 2007

मौन भीतर की अवस्था है बाहर की नहीं

मेरी समझ में आँख बंद करके बैठ जन ध्यान नहीं है । और इस तरह की और भी बहुत से बातें हैं , अंत में मैं आप पर छोड़ती हूँ कि आप ध्यान को क्या समझते हैं । मेरी समझ ये कहती है कि सजगता में रहना ध्यान है पर मौन में ध्यान कैसे करें और मौन कि सीमा क्या है ? क्या अपने आप में बैठकर बोलना मौन का हिस्सा हो सकता है ?

मौन कि तीन स्थितियाँ होती हैं । पहली - वाणी का मौन । दूसरी - मन का मौन । तीसरी स्थिति में काष्ठ का मौन । पर ये शुरुवात होती है । जो गूंगा है उसको हम मौन में नही कह सकते । गूंगे आदमी के पास बोलने कि क्षमता नहीं होती । और उस शक्ति के बावजूद वो निर्णय करे कि ' मैं बात नहीं करूँगा ' । प्रश्न ये उठता है कि वो बात क्यूँ नहीं करेगा , किसलिए ? आप नाराज हो जाएँ या गुस्सा हो जाएँ तब भी आप चुप हो जाते हैं , दुखी हों , आप तब भी चुप हो जाते हैं । सिर्फ़ चुप हो जाना मौन नहीं है । चुप होने के पीछे कारण हैं । कारण कि समझ होनी चाहिए ।

अध्यातम कि दृष्टि से अगर कोई मौन होता है तो सबसे पहला कारण है कि वो अपनी शक्ति को समेटना चाहता है । जो बाहर को जा रही है , शक्ति है , वो उसको समेटेगा । दूसरा , कारण जब हम बोलते हैं । व्यर्थ बोलते हैं । बहुत कुछ व्यर्थ बोलते हैं । जो बात चार शब्दों में कही जा सकती है उसे हम चार सौ शब्दों में कहते हैं । और ये आदत बेहोशी में इस तरह शामिल हो चुकी है कि लोगों को पता भी नहीं चलता कि क्या बोल रहे हैं और कितना बोल रहे हैं । पूरी तरह मौन में जाने तक आदमी को स्वयं को इस कसौटी पर देखना चाहिए कि वो कितना ज्यादा बोलता है । बोलने पर नज़र , बोलने पर दृष्टि रखे । हम लोग दो अतियों पर रहते हैं या हम बहुत ज्यादा बोलेंगे या बहुत चुप रहेंगे ।

बहुत ज्यादा बोलना अगर नुक्सानदेह है तो कई बार न बोलना भी नुक्सानदेह होता है । मौन रख लिया है , और ऐसा फूहड़ है मूड है कि उसमें भी वो अभिमान बना लेता है कि बाकि बोलते हैं लेकिन मैं चुप रहता हूँ , बाकी लोग समय व्यर्थ कर रहे हैं , मैं गहरे मौन में हूँ । मौन होने का अभिमान हो जाता है । मेरे देखे , आदमी को पहले अपने बोलने पर दृष्टि रखनी चाहिए । और अगर इस तरह अपने बोलने पर दृष्टि रखेगा तो जल्दी ही समझ लग जायेगी कि कहाँ और कितना ज्यादा बोलता है । फ़िर उसके बाद मौन में प्रवेश करें । अगर ये देखे बगैर मौन हो जायेगा तो उए मौन में इतनी घबराहट होगी कि उसी घबराहट को दूर करने का तरीका निकालता है जिसे आपने लिखा है कि एकांत में बैठकर भजन गाते हैं । बोलना तो हो गया फ़िर । जब हम कहते हैं कि हमने बोलना बंद किया तो बोलना दूसरे से बंद किया लेकिन शरीर भी तो दूसरा ही है फ़िर इसके साथ क्यों बोलें । पर जो टेंशन बन जायेगी उसको रिलीज कैसे करें । उसे रिलीज करने के लिए वो गायेगा या मन्त्र करना शुरू कर देगा , बोलेगा । बोलना चाह रहा है , किसी और से नहीं बोल सकता तो अपने आप से ही बोलता है । ये कोई बहुत शुभ लक्ष्ण तो नहीं कि अपने -आपसे ही बोलने लग जाएँ । पागल आदमी अपने से ही तो बात करता रहता है , उसे किसी दूसरे कि जरुरत नहीं । कि कोई सामने हो फ़िर वो उससे बतियाय । वर्तालाप नहीं करता , पर वो बोलता है । तो मौन में किसी भी तरह का बोलना निषिद्ध होता है ।

पहली स्थिति आती है जुबान के मौन कि । अब जब जुबान चुप होगी तो शायद पहली बार आपको अपने मन को शोर सुनाई पड़ेगा । विचार का भी शोर सुने पड़ेगा । आँख के अंधे और कान के बहरे हैं क्योंकि अपने ही मन के शोर को नहीं जानते । पर शायद मन का शोर इतना अधिक है कि पूरे संसार के शोर को हम जमा कर दें तो भी वो कम पड़ेगा । वाणी से हम चुप होते हैं इसलिए ताकि हम मन तक अपने ध्यान को ले जा सकें और चेतना को अन्तर्मुखी कर सकें , मन कि दृष्टि जायेगी तब आप देख पायेंगे कि कुछ भी देखने से पहले , कुछ भी सुनने से पहले , या सहज भी जब सुनना होता है जब आप बोलते हैं , जब आप चलते हैं , जब आपके हाथ खुलते हैं , जब आपके शरीर में कोई भी क्रिया होती है , उस क्रिया के होने से पहले आपके शरीर में क्रिया होती है ।

मान लो आपने आँख बंद की है और मन ने ख्याल उठाया कि खुजली हो रही है तो खुजला लो । पहले मन में आया ख्याल , तो ही हाथ चले । अब जैसे साधक बैठा है , मैं फ़िर वापिस उसी स्थिति में ले चलती हूँ , साधक बैठा है और खुजली हो रही है , ये ख्याल आया और उसके साथ ही एक दूसरा ख्याल आया कि मन बेईमानी कर रहा है , मन सिर्फ़ ध्यान से परे करना चाह रहा है इसलिए मन ने झूद में खुजलाने का ये विचार खड़ा किया है वैसे खुजली हो नहीं रही । आपने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल किया और मन के इस अलार्म को आपने इग्नोर कर दिया । थोड़ी देर तक खुजलाने जैसा भाव रहा फ़िर खतम हो गया । फ़िर तीसरा ख्याल आया कि देखा , बेईमानी पकड़ी गई , क्योंकि खुजली तो हो ही नहीं रही थी । है ये ख्याल लेकिन जो शरीर कि हरक़त होनी थी , हाथ खुजलाना था वो सब मूवमेंट नहीं हुई । आपने मन के ही तल पर ठीक कर दी ।

ध्यान में बैठे हो पैर सो गया , पैर हिला लूँ इस तरह के कई ख्याल उठे पर हर विचार के आते ही अगर हमने क्रिया में नहीं बदल दिया और उस विचार को समझा कि सच में क्या ऐसा हो भी रहा है ? धैर्य से काम लिया उस विचार को ही देखा तो थोड़ी देर में देखा कि ऐसा कुछ नहीं , और वो ख्याल भी विलीन हो गया और जो बॉडी कि मूवमेंट व्यर्थ कि होनी थी ध्यान में , वो भी नहीं हुई ।

अब अपने एक विचार के चलने पर जब तुम्हारा हाथ चलता है तो इसका मतलब आपके शरीर में जितनी क्रियायें हो रही हैं वो तब होतीं हैं , जब आपके मन में हलन - चलन होती है । पहले मन में आया है विचार , शरीर उसके बाद क्रिया करता है । पहले मन में उठेगा ख्याल , आँखें तब देखेंगी । अब आप आँख बंद करके विश्राम कर रहे थे , आवाज कोई कान में आई कि देख ! क्या है ? फट से आँख खुल गई , बिस्तर से उठ गया , खिड़की तक गए , बाहर गली में झांका तो देखा कि कुछ बच्चे लोहे कि छड़ के साथ खेल रहे हैं तो उसी की आवाज आ रही थी । देख लिया तो निश्चिंत हो गए और फ़िर वापिस आकर विश्राम में ख़लल जो आया वो मन के एक विचार से आया ।

बहुत सी स्थितियाँ आप देखते हैं अपने जीवन में । दिन से लेकर रात तक शरीर जो भी क्रियायें करता यहाँ तक की इसको थोड़ा और आगे लेकर चलना चाहूंगी मैं कि हमारे के शरीर भीतर बहुत सी क्रियायें होती हैं जो हमारे मन से जुड़ीं हैं । जैसे मन दुखी हो , तो कहने कि इच्छा लग जाए , मन में कोई चिंता आ जाए , मन में कोई दुःख आ जाए , मन में कुछ परेशानी हो रही हो , तो अजीब से पूरे शरीर में कुछ मीठा खाने कि तलब उठने लग जाती है । अब वो भूख नहीं थी , मन अपने से अपनी घबराहट को छिपा रहा था , उस घबराहट को उसने डायवर्ट कर दिया पेट में , अब लग रहा है कि शायद यहाँ कुछ है । यहाँ क्या है ? भूख है , तो कुछ खाने चले गए , भूख थी नहीं पर झूठ की भूख लग रही थी ।

ऐसे ही झूठ का सिरदर्द होता है , महिलाओं को अक्सर होता है । चार बजे के बाद से इनको सिरदर्द शुरू हो जाता है । सच में नहीं होता , मन अंदर ही अंदर खेल खेल रहा होता है । मन को ये समझ है कि अगर हम बीमार हैं या दुखी बैठेंगे , उसके बहुत सारे फायदे हैं , काम नहीं करना पड़ेगा । निक्कमे तो होते ही हैं , काम नहीं करना पड़ेगा , अटेंशन मिलेगी , घर के लोग आकर पूछेंगे , पति भी आकर पूछेगा और फिर बीमार हालत में कहते कि फिर घुमा लाओ , थोड़ी बाहर कि हवा खा लें , ऐसे तो नहीं ले जायेगा , वैसे कहें तो कहेगा कि थका हुआ हूँ फिर कभी चलेंगे , या कहे कि तुम्हीं हो आओ । इतनी चालबाजियां होती हैं । यूँ कहो कि आपका मन आपको ही चलता है और आप मजे से छले जाते हो , पता भी नहीं चलता । मन शरीर में झूठ के रोग खड़े कर सकता है ।

अब अगर ये मन कि ताकत समझ लग जाए और आप अपनी सहक्ति को विधायक उपयोग करें तो नतीजे दुसरे हो जायेंगे । जो रोग बने थे वो मिटाए जा सकते हैं । जो झूठ को भूख लग , लगके , खा , खाके मोटे हो रहे थे उससे बच सकते हो । अब विचार कोई उठे और आप तुंरत अगर उस पर अमल कर लेते हैं तो आप कोई बहुत समझदार व्यक्ति नहीं हैं । आप अपने ही मन को नहीं जानते । इसलिए मन कुछ भी कहे , उसे करने से पहले उस विचार कि सार्थकता को , उस विचार के मूल को , उस विचार कि गहराई को समझ लेना चाहिए । अब ये काम करने के लिये आपको निश्चिंत ही एक चीज कि आवश्कता है वो है सजगता । तो एक तरह से ध्यान क्या है ? ध्यान है सिर्फ़ जगह रहना । चूँकि आप सजग नहीं रहते हैं सीधे सजग नहीं हो पाते हैं इसलिए आपको मैं ध्यान कि विधियों के बहने तुम सजग हो जाते हो । अगर आप जल्दी से अपने जीवन में सजगता को ले आयें तो मुझे नहीं लगता कि ध्यान कि विधियों को सीखने के लिए मेरे पास आने कि जरुरत होगी । पर तुम्हें जरुरत पड़ेगी । वो इसलिए पड़ेगी क्योंकि बेहोशी तुम्हारी बहुत गहरी है । अब उस गहरी बेहोशी को तोड़ने के लिए जरुरत होती है कुछ बाहरी साधनों कि , कुछ बाहरी अवलम्बनों की । इसलिए अगर कोई मौन में जाना चाह रहा है और मौन का गहरा स्वाद लेना चाह रहा है , अब आपने लिखा कि ' घर में दिक्क़त होती है ' अब दिक्क़त तो होगी ही क्योंकि घर में परिवार है , पास - पड़ोस है , सगे - सम्बंधी हैं , कोई आएगा , कोई कहेगा कि ' तुम तो पागल हो गए हो , कोई कहेगा कि साधू हो गए हो , कहाँ गुरुओं के चाकर में पड़ गए । ' अब आप इतने सहनशील तो हैं नहीं । सब सुनकर तुम उत्तेजित हो जाओगे , क्रोध में आ जाओगे और मन उसकी बुरे या अच्छाई करने लग जायेगा या आप जिस ट्रैक पर चलना चाह रहे थे उस ट्रैक से बिगड़ जाओगे । इसलिए घर में साधना करने में जो भी दिक्क़त आए , आश्रमों का निर्माण इसीलिए तो हुआ है कि आप जयादा दिन न सही तीन , चार दिन का , सात , आठ दिन का , ग्यारह दिन का जो मौन है वो अगर आप करना चाह रहे हैं तो अच्छा ये रहेगा कि आप आश्रम में रहकर करो । अगर इस तरह कि सुविधा बना सकते हैं , यहाँ भोजन बनने कि फिकर नहीं , आरती के घंटे - घड़ियाल उठा देंगे । आपका कोई अड़ोस- पड़ोस वाला भी नॉक कर देगा कि आरती में चलें । अनुकूल वातावरण होगा ।

आश्रम में २१ दिवसीय एकांत मौन चल रहा है वो अपनी जगह पर । लेकिन एक ही कमरे में रहकर मौन कि उस और गहरी स्टेज में जाए , इससे पहले अच है कि कुछ दिन ऐसी ही नार्मल चलते - फिरते , आश्रम में रहते हुए मौन में रहे । एक ही कमरे कि जो सीमा है उसमें न रहे , बाहर आय , सत्संग में , दर्शन में बैठे । अगर कुछ सेवा करना चाहे , तो वो भी करे । या जहाँ सब लोग मिल रहे हैं अगर उसमें शामिल होना चाहे तो वो सब कंटीन्यू करे लेकिन मौन चलता रहे । तो मौन का यह लंबा अभ्यास , पर फिर वही बात आएगी कि अगर आप होश से नहीं करेंगे तो फिर इसमें भी परेशानी खड़ी कर देंगे । यूँ समझिये आप , कि अगर बेहोशी कि आदत को आप तोड़ते नहीं हैं तो फिर घर में रहो , बेहोश ही रहोगे । और बेहोशी को तोड़ना सीखना चाहते हैं तो घर में रहके थोड़ा सा मुश्किल होगा पर आश्रम में रहकर ज्यादा सहज होगा ।

कई बार ऐसा होता है कि आश्रम में ही रहने वाले किसी व्यक्ति से ज्यादा लगाव हो जाए तो लगता कि अच्छा नहीं अब संबंध बनने कि बीमारी है न , तो वो यहाँ भी बना लेता है । कई बार तो ऐसा हो जाता है कि वो इतने गहरे संबध बना लेते हैं कि वो ये भी भूल जाते हैं कि वो आश्रम में किसी लक्ष्य के लिए आए हैं । वहां पर भी वो पसंद कर लेता है कि यह अच्छा है ये नहीं अच्छा है । इससे बात करेंगे , इससे नहीं करेंगे । इस को बुलायेंगे , उसको नहीं बुलायेंगे । तुम लोगों के संबंध बना लेने कि जो कमीं हैं उसी कमीं को समझते हुए आश्रम में हर आदमी कोई एक ही काम को एक व्यक्ति नहीं कर रहा । अगर आप सोचते हैं कि आज अभिनव ने पत्र पकड़ के दिए तो अगले इतवार भी देगा तो इससे तुम दोस्ती बना लो , तो यह नहीं होगा , ये कहीं और होगा । ये क्यों करना पड़ता है ताकि ये जो मित्रतायें बना लेते हो फिर तुम्हारी पालिटिक्स शुरू हो जाती है । बीमार है न मन , ये जहाँ जाता है बीमारी फैलता है । तो फिर यह भूल जाता है कि घर के संबंधों से दुखी हो कर यहाँ आया और यहाँ भी वही सब करना शुरू कर देते हो । तो बेफकूफी का कोई अंत नहीं । लेकिन फिर घर कि अपेक्षा यहाँ पर मौन में रहना ज्यदा सहज होगा । तो तीन दिन को , सात दिन को , ग्यारह दिन को मौन में रहे । एक बार यह अनुभव ले लें फिर जब लगे कि मौन कि समझ आ गई , ख़ुद को देखने कि समझ आ रही है , चुप रहना अच लग रहा है फिर धीरे-धीरे जो कमरे में रह कर जो २१ दिन यह तप है इसमे चला जाए ।

कई लोग मैंने देखा कि वो सीधे २१ दिन के मौन में आ जाते हैं । पूछ लेते हैं कि हम २१ दिन के मौन में आ सकते हैं ? कमरा है ? पूछ कर आ जाते हैं । पर कभी भी थोड़ा मौन का स्वाद लिया नहीं , सीधे २१ दिन वाले मौन में चले गए । तो फिर कोई चौथे दिन भागता है । कोई छठें दिन भागता है , मुश्किल है रहना , कैसे रहेगा ? क्योंकि जो सारा समय बकबक करता रहता है , उसको अचानक एक कमरे में रहना तो सजा हो जायेगी ।

इसलिए सीधे २१ दिन मौन में जाने से पूर्व सात दिन का या ग्यारह दिन का सहज मौन करें , यहीं आश्रम में रह कर । सहज मौन में आप नार्मल सहज होकर जो भी आश्रम कि गतिविधियाँ हैं उसमें शामिल हों , पर रहे मौन । धीरे - धीरे समझ आ जाती है कि मौन कैसे रहा जाता है

ऋषि अमृत अक्टूबर - २००६

क्या है प्राणायाम

प्राण का अर्थ है ऊर्जा । इस ऊर्जा से सारा स्थूल , भौतिक जगत हुआ है । और इसी प्राण ऊर्जा से यह हमारा स्थूल शरीर भी हुआ है । अगर मनुष्य के शरीर में से एक सैल निकालकर माइक्रोस्कोप में रख कर देखो तो क्या दिखेगा । मॉस , अगर आप मॉस को फ़िर वापिस विघटित करें तो उसमे से निकलेगा एटम । विज्ञानं कहता है कि उसमें से ऐसी ऊर्जा निकलेगी जो हमारी समझ के बाहर है ।

प्राणायाम का अर्थ है अपनी - प्राणऊर्जा को विस्तारित करना । चीन में प्राण को ' ची ' कहते हैं । एक्युप्रेशर , एक्यूपंचर इसी ऊर्जा के आधार पर है । इनकी थ्योरी कहती है कि हमारे शरीर में मैरीडियन हैं , जिनमे ऊर्जा प्रवाहित हो रही है । जब जब यह ऊर्जा कहीं ब्लाक हो जाए , तब रोग होते हैं । अब अगर आप शरीर का चीर - फाड़ करके देखें तो ऐसी कोई मैरीडियन दिखेगी नहीं । परन्तु जिसे वह मैरीडियन कहते हैं या योग में जिसको नाड़ी कहते हैं , वह भौतिक नहीं है , वह स्थूल नहीं है ; बल्कि सूक्ष्म है ।

हमारी एक नसें हैं जो जो स्थूल रूप में दिखाई पड़ रही हैं । पर दूसरी स्थूल प्रवाह की नसें हैं , जिसमेसे प्राणऊर्जा दौड़ रही है । अब इसी प्राण के पाँच प्रकार हैं - अपन , व्यान , उदान , समान , प्राण । हमारा पूरा शरीर इसी प्राण के अधर पर चल रहा है । प्राण वायु का क्षेत्र कंठनली से श्वासपटल के मध्य है , इसको यह प्राणवायु कंट्रोल करता है ।

अपान नाभि के नीचे जितने अंग हैं , इनकी कार्य प्रणाली को अपानवायु नियंत्रित करता है । जो कुछ हम खाते हैं उसको पचाना और जो व्यर्थ है उसे मल - मूत्र के रूप में बाहर निकलना ; यह कार्य अपानवायु से संचालित होते हैं । अपान हुम्र्रे पाचनक्रिया को कंट्रोल करती है , जैसे गालब्लेडर , लिवर , छोटी आंत , बड़ी आंत ; ये सब इसी क्षेत्र में आते हैं ।

उदान - कंठ के साथ जुड़े जितने भी अंग हैं ; आँख , कान , नाक , जीभ , बोलना , स्वाद लेना ; ये ज्ञानेन्द्रियाँ जो हैं , इनके सारे कार्य उदानवायु से होते हैं । जब तक उदानवायु है , तब तक आँखें देखेंगी , कान सुनेंगे , जीभ बोलेगी , नाक सुंघेगा । उदानवायु के द्वारा हमारी जो कर्मेन्द्रियाँ हाथ - पैर और नाभि के ऊपर के सारे अंग ; जैसे हृदये की धड़कन , हृदये की धमनियां आती हैं , फेंफडे यह सब उदान की शक्ति से कार्य करते हैं ।

समान - यह हमारे शरीर के मध्य भाग में होती हैं । अपान और उदान की जो बैलेंसिंग है , यह समान वायु के द्वारा होती है । समान का कार्य बैलेंसिंग का है ।

व्यान - यह प्राण हमारे पूरे शरीर में है । इसको हम सर्वव्यापी भी बोलते हैं । अर्थात जो पूरे शरीर में फैला हुआ है ।

इन पंचप्राणों के भी पाँच उपप्राण हैं - जैसे हिचकी , आंखों का झपकाना , यह भी प्राण से हो रहा है ।

अब प्राणायाम का सीधा सम्बन्ध इन्ही पंचप्राणों से है । पूरे शरीर का कार्य इन पंचप्राणों से हो रहा है और इन पंचप्राणों पर सीधा प्रभाव देता है - प्राणायाम ।


प्राणायाम का मतलब सिर्फ़ श्वास को अन्दर - बहार करना नहीं है , इसका सम्बन्ध सिर्फ़ श्वासों से नहीं है । बल्कि प्राणायाम का सम्बन्ध आपके शरीर में मौजूद इन पंचप्राणों से है और आप देखेंगे की इन पंचप्राणों के ऊपर आपका कंट्रोल पूरा बन जाए । तब तुमारा दिल तब तक धड़केगा , जब तक तुम चाहोगे । अभी तो अचेतन मन से सारा कार्य हो रहा है हमारा मस्तिष्क , हमारा हृदय , ज्ञानेन्द्रियों के सारे कार्य उदानवायु के द्वारा कंट्रोल हो रहे हैं । उदान का क्षेत्र क्या है इसकी समझ आती है प्राणायाम से ।

अब प्राणायाम भी कई प्रकार के हैं

प्राणायाम का मतलब सिर्फ़
श्वास को अन्दर - बहार करना
नहीं है , इसका सम्बन्ध सिर्फ़
श्वासों से नहीं है ।
बल्कि प्राणायाम का सम्बन्ध
आपके शरीर में मौजूद
इन पंचप्राणों से है


जिनमें से कुछ प्राणायाम ऐसे हैं , जिससे शरीर में उष्मा बड़ाई जाती है । कुछ प्राणायाम ऐसे हैं जिससे शरीर में शीतलता बड़ाई जाती है । कुछ ऐसे है जिससे मस्तिष्क की और श्वास की बैलेंसिंग की जाती है ।

बहिरंग के बाद योग के अंतरंग साधन चार हैं । बहिरंग साधन - यम् , नियम , आसन , प्राणायाम के बिना अंतरंग में प्रवेश नहीं हो सकता । जीवन में अस्तेय , सत्य , ब्रह्मचर्य नहीं है तो आसनों का कोई लाभ नहीं । संतोष , तप , स्वाध्याय , ईश्वर - प्रणिधान में गुरु भी समाहित है । ईश्वर या गुरु के बगैर इस मार्ग में प्रवेश सम्भव नहीं है । और इसकी अनुभूति के लिये संतोष , तप बहुत बड़े अस्त्र हैं ।

तो जब यह नियम का पालन करते हुए आसन करते हैं , तो हम आसन द्वारा अपने अन्नमय कोष , मनोमय कोष , प्राणमय कोष को भी प्रभावित कर सकते हैं ।

हमारे शरीर के भीतर मौजूद स्त्राव - ग्रंथियों और कैमिकल के कारण हमारे मूड बनते हैं । इसका मतलब जब तुमारा गुस्सा आया होता है तो गुस्से में भी तुम्हारे गुस्से का कारण तुम्हारा अशुद्ध शरीर है । अशुद्ध को में एक किनारे भी रख दूँ , तो भी में यह कहूँगी की अशुद्ध मस्तिष्क है । इड़ा और पिंगला का बैलेंस नहीं है । सुषुम्ना तो क्या जागृत होगी , सत्य तो यह है की इड़ा भी जागृत नहीं है । बायीं श्वास चलने का मतलब यह नहीं कि तुम्हारी इड़ा चल रही है । और दायीं चल रही हो तो इसका मतलब यह नहीं कि पिंगला चल रही है , क्योंकि इड़ा और पिंगला तो सुप्त हैं , जागृत नहीं हैं उनको भी जागृत करना पड़ता है । और इड़ा और पिंगला को जागृत करने के लिये आसन , प्राणायाम अत्यावश्यक हैं ।

जिनकी इड़ा जागृत हो , वह बहुत क्रियात्मक , रचनात्मक , बुद्धिमान , चिन्ताशील , ग्रहणशील व्यक्ति होता हैं । जितने वैज्ञानिक होते हैं , इनकी इड़ा जागृत होती है । यह कोई चोटी बात अहं है कि तुम कहो कि दायीं नासिका बंद कर बायीं चला लो और कहो कि इड़ा चल रही है , ऐसा नहीं है यह मूलाधारचक्र से प्रारम्भ हो कर आज्ञाचक्र पर समाप्त होती है , यह इड़ा का सूक्ष्ममार्ग है ।

नाड़ी का अर्थ नसें नहीं है । नाड़ी का अर्थ है प्रवाह । मूलाधारचक्र से शुरू हो कर आज्ञाचक्र पर उसका समापन होता है । और इड़ा और पिंगला दोनों ही मूलाधार से प्रारम्भ हो कर आज्ञा तक पहुँचती हैं । एक तीसरी नाड़ी जिसे सुषुम्ना कहते हैं

अगर साधक विशेष
प्रयास करे और अपनी
इड़ा और पिंगला को
जागृत करे , तो जो गुण
उसके पास नहीं है ,
वे भी आ जायेंगे ।

यह भी आज्ञा तक आती है , इसीलिए आज्ञाचक्र को प्रयाग भी बोलते हैं । गंगा , यमुना , सरस्वती ; गंगा है - पिंगला । यमुना है - पीडा और सरस्वती है सुषुम्ना ।

बहार जो भौतिक प्रयाग हैं , यहाँ पर भी सरस्वती दिखाई नहीं पड़ती । परन्तु हिंदू ऐसा मानते हैं कि सरस्वती लुप्त है , अदृश्य है , पर बह रही है । जहाँ गंगा , यमुना , सरस्वती तीनो धारायें मिलती हैं , उसी को कहते हैं प्रयाग । तो एक यह भरी प्रयाग है और एक हमारे भीतर प्रयाग है । जो भीतर प्रयाग है उसको कहते हैं आज्ञाचक्र ।

जिसकी पिंगला जागृत हो वह बहुत कर्मशील व्यक्ति होता है । कर्मशील व्यक्ति निष्काम कार्य करता है । वह कार्य को किसी अर्थ के लिए नहीं करता । अगर वह धन भी कमाएगा तो धन के पीछे भी उसकी धारणा समाज - कल्याण या देश - कल्याण के लिए होगी । जिसकी पिंगला जागृत हो वह एक कुशल राजनेता हो सकता है , योद्धा हो सकता है , एक राजनीतिग्य हो सकता है , आर्मी का जनरल हो सकता है । यह जो लोगों को प्रोमोशंस मिलते हैं , यह ऐसे ही नहीं मिल जाते । उनकी पिंगला जागृत होती है , उनकी पिंगला जागृत होई है इसलिये उनको यह तरक्कियां मिलती हैं । जिनकी पिंगला जागृत होती है उनके लिए प्रकृति ऐसे संयोजन खड़े कर देगी , इसीलिए उनकी उत्तरोत्तर उन्नति होती जाती है ।

जो लोग जीवन में उन्नत नहीं हो पाते , जो कर्मशील नहीं हैं , जो चिंतन - मननशील नहीं हैं ; मतलब यह कि शरीर जरुर उनका मनुष्य का है , पर उनकी न इड़ा जागृत है , न पिंगला । इसीलिए खाए - पीए , भोग , भजन और मृत्यु ; बस उनका जीवन इतना ही है ।

इसका अर्थ यह भी हुआ कि अगर साधक विशेष प्रयास करे और अपनी इड़ा और पीड़ा को जागृत करे , तो जो गुण उसके पास नहीं भी हैं , वे भी आ जायेंगे । इड़ा जागृत होगी तो तुम्हारा मस्तिष्क उन्नत हो जायेगा , चिंतनशील हो जायेगा और चिंतन - मनन वाले व्यक्ति अपने जीवन में बहुत से उपलब्धियों को प्राप्त करते हैं ।

कर्मशील व्यक्ति अपने जावन में सम्मान और प्रतिष्ठा को पाते हैं । उनके लिए जीवन में एक उदेश्य होता है , तो उनकी बौधिक क्षमता विकसित होती है ।

जिसको हम मुर्ख कहते हैं , वह कौन व्यक्ति हैं ? जिनके मस्तिष्क का आधा हिसा सोया होता है । मस्तिष्क का तीन प्रतिशत हिसा तो साधारण लोगों का जगा होता है ।

जब आप आसन , यम , नियम , प्राणायाम अपने जीवन में लेकर आते हैं और प्रतिदिन इसका अभ्यास करते हैं , अगर छ: महीने से एक साल तक बराबर श्रद्धा भाव से शरीर का शुद्धिकरण करते हुए नेति , प्रक्षालन , कुंजल करते रहें तो जीवन में प्रत्याशित उन्नति दिख जायेगी ।

जिनकी इड़ा और पिंगला जागृत होगी , उन्ही के सुषुमाना के जागृत होने कि सम्भावना बनेगी । जिनकी ये तीनो जागृत हैं , वही चक्रों का अनुसंधान कर सकेगा । और जो चक्रों का अनुसंधान करेगा , उसी के कुंडलिनी जागरण हो सकेगा । और जब कुंडलिनी मूलाधार से उठ कर मणिपुर , अनाहद , विशुद्ध , आज्ञा इत्यादी चक्रों का भेदन करती हुई सहस्त्रार तक पहुँचती है , तब यहीं पर पहली सविकल्प समाधि घटित होती है ।

अपना उद्धार अगर चाहते हो तो तुम्हें यह बात समझ लेनी चाहिए कि ज्ञान सुना - सुनाया मात्र कुछ सूचनायें हैं , जो थोडी देर के लिए तुम्हें रस देती हैं । लेकिन उसके बाद तुम्हारे किसी काम की नहीं । वर्षों से सत्संग सुन रहें है , लेकिन सुनना तो बस कानों तक ही गया जीवन का रूपांतरण तो हुआ ही नहीं ।

ज्ञान का प्रतिफलन भी उन्ही को होता है , जिनमे विवेक , वैराग्य , मुमुक्षता , सत्संग आदि गुण होते हैं । जिनमे यह चारों गुण नहीं होते , उनको सिर्फ़ एक अभिमान होता है कि हम ज्ञान सुनते हैं , हमें सब पता है । लेकिन अपने चित्त के , अपने मन के साक्षी तो तुम हो । तो यम , नियम , आसन , प्राणायाम अगर विधिवत् ढंग से अगर जीवन में आए........ अगर केवल प्राणायाम के साथ ही गहरी दोस्ती हो जाए तो आटोमैटिकली जो योग कि पांचवी अवस्था है उसमें प्रवेश हो ही जायेगा । वह है प्रत्यहार ।














आज ध्यान में विचारों के प्रवाह में कविता को उभरते देखा


पत्थर को हीरा और हीरे को पत्थर बनते देखा
कहीं पत्थर को तराशते हुए सदगुरु को देखा
आज ध्यान में विचारों के प्रवाह में कविता को उभरते देखा

अनुभव किया सतगुरु की कृपा को
और हृदय में स्मपन्दित प्रेम को देखा
मन के बदलते हाव - भावः को ,
बहार से कठोर और अन्दर से नर्म सतगुरु को देखा

उल्टे घड़ों को सीधा होते और
फटे दमन में कृपा को सम्भालते देखा
अभिमान को स्वाभिमान में कुछ बदलते और
सतगुरु के निर्देशों पर ख़ुद को ख़ुद - - ख़ुद चलते देखा

अध्यात्म पथ को देखा और
इस पथ पर पहुँचने के लिए अपने को बहुत दूर देखा
आशा - निराशा को देखा और
इनके बीच उभरते धीरज के उजाले को देखा
आज ध्यान में विचारों के प्रवाह में कविता को उभरते देखा
श्रद्धा

ऋषि अमृत दिसम्बर 2003

गुण चुन अवगुण नहीं



" फरीदा ख़ाक निंदिये , खाक जेवड कोए
ज्योंदेयाँ
पैरां तले मोंयाँ ऊपर होए "

पर हम इस बात को कहाँ याद रखते हैं , हमको तो फुर्सत कहाँ हैं , लोगो की कमियां , लोगो के अवगुण , बस वही देखते रहते है । क्या कमी है , क्या कमी है , देखो उसको । फरीद कहते है -

" फरीदा जे तू अकाल लतीफ़ , काले लिख न लेख
आपने गिरबान में सिर नीवां कर देख "

काहे समय गवाओ कि पड़ोस के लोग क्या करते हैं , दुसरे लोग क्या करते हैं , दूसरों कि कमियां , दूसरों के अवगुण देखते फिरो , क्यों ? अरे , किसी बाग़ बगीचे में जाओ तो क्या देखोगे , कांटे कि फूल ? गुलाब कि झाड़ी के करीब भी जाओगे तो काँटों से हाथ बचा बचा के फूलों को तोड़ोगे । कैक्टस काँटों से भरा पौधा है पर किन्ही एक कैक्टस कि प्रजाति में जैसे लोटस कैक्टस , निचे तो कांटे ही कांटे हैं अंतत बहुत सुंदर फूल खिल जाता है , बड़े खुबसूरत रंगों में फूल खिलता है । कैक्टस के लगे हुए फूल को भी अगर लेना चाहोगे तो बड़ा बचा के उसको तोड़ोगे , काँटों से हाथ को बचा के फूल को तोड़ लोगे ।

अगर बगीचे से तुम फूल चुनते हो और काँटो को छोड़ देते हो तो मनुष्य के गुणों को चुनों , उसके अवगुणों को छोड़ दो । पर तुम बन जाते हो समाज सुधारक । हम निकलें है समाज को सुधारने । भई, पहले अपने आप को तो सुधार ले । गंदे पोचे से जमीन को साफ़ करने लगोगे तो जम्में साफ़ नहीं उल्टे और गन्दी हो जायेगी । पोछा पहले साफ़ करलो । गंदे झाडन से आप साफ़ चीज को भी और गन्दा कर लोगे । गुरु अर्जुन देव जी ने सुखमनी साहब में बड़ा सुंदर कहा -
'अवर उपदेशे आप करें , आवत जावत जन्मे मरे '

दूसरों को उपदेश दे रहा है सुधर जाओ , माया छोड़ दो । गा रहे हैं - ' माया छड जानी । पीछे सब बोल रहे हैं , माया छड जानी' ख़त्म हुआ कीर्तन तो कहते , माया कित्थे ? ओ लिफाफा कित्थे है ? सवा लाख रुपये कि बात हुई थी ये तो कम लग रहे हैं , ये पूरे पैसे दो जी । एक ने कहा - अभी तो आपने गया है, ' माया छड जानी ' तो २००० अगर कम है तो उसको तो छोड़ जाओ । वो कहते , ये दूसरों को सुनने के लिये कहते हैं ' माया छड जानी , हमको ले के जानी ' दुसरे छोडे हम थोड़े छोडेंगे ।

'अवर उपदेशे आप करें , आवत जावत जन्मे मरे '

उपदेष्टा है , कथा करता है , उपदेष्टा है , संसार को उपदेश दे रहा है । एक ने कहा महाराज - ! घर में चरण डालो , सेवा का मौका दो । कहते - ' अच , फ़िर हमारी सेवा क्या करोगे ?

तो सेवा मोटी दिखती हो तो जाता है और सेवा मोटी न दिखती हो तो नहीं जाता । बैठ के उपदेश दे रहा है ।

पर कभी कभी ऐसे वक्ताओं के विषये में मैं ये करती हूँ , चलो कोई नहीं , बाल बचे पालने हैं उसको , डेरा स्थान चलाना है , आश्रम चलाना है , कोई नहीं जो कर रहा सो कर रहा पर जितनी देर ढंग कि कुछ बात कह रहा है वो ढंग की बात को तो पकड़ लो । सर्वगुण संपन नहीं है तो कोई बात नहीं , उसके उतने हिस्से को ले लो जितने हिस्से को वो कह रहा है । वो माया छोड़ रहा है कि नहीं छोड़ रहा , अगर उसकी कही हुई बात को सुनके आपने माया से फंदा छुडा लिया तो गुरु जी तो बंधे रह जायेंगे बंधन मैं , चेले जी मुक्त हो जायेंगे ।

" फरीद जे तो अक्ल लतीफ़ , काले लिख न लेख
आपने गिरबान में सिर नीवां कर देख "

अपने अन्दर झाँक के देख , दूसरों को नुख्ताचीनी न करो । नुख्ताचीनी करने की आदत है तो अपनी और नुख्ताचीनी करके देख ले कि इधर क्या कमियां हैं । पर हम अपनी कमियाँ नहीं देख पाते हैं , दूसरों कि दिख जाती हैं ।

ऋषि अमृत मार्च 2002

रूमी



'रूमी' नाम है उस परवाने का जो उस रब की शमा पर मर मिटा सदा के लिए अमर हो गया । रूमी एक सूफी है और सूफी कीसी इंसान का नाम नहीं है , सूफी नाम है प्रेम का !

तुर्किस्तान मैं पैदा हुए इस जलालुद्दीन रूमी नाम के सूफी के बारे में बचपन में ही भाविश्येवानी कर दी गई थी - यह जलालुद्दीन अपने सागर के वलवलों में अपनी लहरों में कितनों को अल्लाह वाला कर देगा ।

और हकीक़त थी । आलिम और फाजिल रूमी के दिल में प्रेम की शमा जलाई इनके प्रियतम सद्गुरु शम्स तबरीज़ ने । जब इस मुहबत रुपी चिंगारी ने आग पकड़ी तो रूमी नाचते हैं , बजाते हैं । मुस्लिम धर्म में नाचना - बजाना शरा - शरीयत के विरुद्ध है । वह यह भी भूल गए और उन्होंने संगीत और शायरी को अल्लाह के ज़िक्र में जोड़ दिया ।

उन्होंने कहा था , ' मेरे टेके में बेनदीर के बिना तुम आओगे ' उन्होंने यह बात कही कि संगीत सिर्फ़ कानों का रस लेने कि विद्या नहीं है । यह तो अल्लाह से जुड़ने का जरिए है ।

उन्होंने हजाओं कवितायें और कहानियाँ लिखीं । उन्ही कविताओं के माध्यम से ज्ञान के सूत्र दिए । परमपूज्य गुरुदेव आनंदमूर्ति गुरुमाँ ने जब इन कविताओं को पड़ा , तो उन्होंने इतने सहजता से इनका हिन्दी अनुवाद किया , जैसे वे इन कविताओं का अनुवाद नहीं कर रहे थे , ये कवितायें उनके भीतर से प्रस्फुटित हो रहीं थी । इस पर सोने पर सुहागे का काम किया संगीत ने , जो इन कविताओं के साथ जुडा और एक नई एल्बम "रूमी" नाम से हम शिष्यों के लिए प्रसाद रूप से आ गई ।

यह एल्बम गुरुमाँ कि हम सब को एक अनमोल भेंट है , जिसमें सुंदर व् दिल को छूने वाली कविताओं का उचारण है । इन कविताओं में छुपे प्रेम , दर्द , विरह के भावों को वाही महसूस करे , जो इसे सुने क्योंकि शब्दों में उस अहसास को नहीं बाँधा जा सकता।
ऋषि अमृत पत्रिका मार्च 2006

शक्ति के उपासक क्यों लगाते हैं जननी के जन्म पे अंकुश


कोलकाता -- दुर्गा और काली के देश में हो रहा है जननी का अपमान। इस देश में लोग जहाँ नारी की पूजा करते हैं वहीं उस के जन्म पर अंकुश भी लगाते हैं। कोलकाता वासियों पर अमृत वर्षा बरसाने आए आनंदमूर्ति गुरुमाँ ने पत्रकारों से हुई खास बातचीत में कहा कि :

पत्रकार : गुरुमाँ , सबसे पहले ये बताए की इस पुरुष प्रधान बताए जाने वाले देश में धारा से अंबर तक की आपकी यात्रा क्या आसान रही?
गुरुमाँ - मेरे और मेरे अनुयाइयों के बीच वीश्वास ही है। इसी के माध्यम से मैं सबको रूढ़िवाद की राह पर नहीं, बल्कि परंपरा व संस्कृति की राह तक पहुचाती हूँ । सफलता की राह में समस्याएं तो अनगिनत आईं, लेकिन आत्मविश्वास और दृढ़ता ने मुझे इस मुकाम तक पहुचाया। अभी तक कभी किसी पुरुष ने मेरा मार्ग प्रत्यक्ष रूप से नहीं रोका है। अगर भविष्य ने ऐसा कुछ दिखाया तो स्वयं को किसी से कम नहीं मानूँगी।
पत्रकार : क्या आपको लगता है कि भारत में परंपरा के नाम पर महिलाओ को दबाया जाता है ?
गुरुमाँ - हम भारतवासीयों को परंपरा व संस्कृति विरासत में मिली है, लेकिन इसके नाम पर महिलाओ को जबरन दबाया जा रहा है। हमारी संस्कृति में औरत को शक्ति का रूप माना गया है लेकिन 21 वी सदी के भारत में आज भी इसके नाम पर औरतो को अबला, कमजोर, अशुद्ध, आश्रित और अज्ञानी ही बनाया जा रहा है । औरत को शक्ति और पराक्रम का पाठ कोई नहीं पढ़ाता क्योंकि पुरुष स्वयं को उपर रखने के लिए सबला को भी अबला की उपाधि देता है ।
पत्रकार : क्या आपको लगता है कि ग्रामीण भारत में अज्ञानता के अधिकार पर ज्ञान की रोशनी डालना आसान है ?
गुरुमाँ - अज्ञानता के अंधकार पर ज्ञान की रोशनी डालना यूँ तो कभी आसान नहीं होता लेकिन मैने देखा है कि ग्रामीण महिलाएँ आगे आने को तैयार हैं, बस उन्हे एक आवाज़ लगाने की देर हैं । मेरा अनुभव बताता है कि ग्रामीण महिलाओं को राह दिखाना शहरी नारियों के मुक़ाबले अधिक आसान है। मैं अध्यात्म के दृष्टिकोण से महिलाओं को सशक्त बनाने की कोशिश करती हूँ और अब तक इस कोशिश में कामयाब भी रही हूँ ।
पत्रकार : नारी को सशक्त बनाने के लिए दिए गये प्रवचनो को सुनकर पुरुषों की क्या प्रतिक्रिया होती है ?
गुरुमाँ - किसी भी इंसान में समझ का अभाव नहीं होता, बस फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि कौन क्या समझना चाहता और क्या करना चाहता है । मैं यह तो नहीं कहती कि पुरुष को महिलायों के नीचे रहना चाहिए । मैं पुरुषों को सिर्फ़ यही कहती हूँ कि आप महिला को इज़्ज़त तथा उसे उसका उचित स्थान दें ।
पत्रकार : आपके अनुसार आगे बढ़ रहे समाज में महिलाओं को अनजाने में भी अनदेखा किया जा रहा है?
गुरुमाँ - अनजाने में ही उनको कम जान कर अनदेखा किया जाता है । मैं एक ऐसी युवती को जानती हूँ जिसने अपने पिता से झगड़ कर बाहर जाकर डाक्टरी कि पढाई की । इसके बाद उसने शादी की लेकिन शादी के बाद डाक्टरी छोड़ दी और अपने पति की फॅक्टरी में उसके साथ काम करने लगी । वह पिता से तोलड़ पाई लेकिन अपने जीवन साथी का विरोध नहीं कर पाई । इसी प्रकार कई महिलाएँ ऐसे ही अपनी इच्छाओं को दिल में दबा कर जी रही हैं ।
पत्रकार : अगर अध्यात्म की बात करें तो आज की भागती हुई ज़िंदगी को स्थिरता कैसे मिल सकती है ?
गुरुमाँ - इसका एक सीधा सा तरीका है, अपने आप से प्रश्न करो... पूछो खुद से तुम्हारा जन्म क्यों और किसलिए हुआ है? तुम्हे क्या करना है? इसी प्रकार किसी को भी संतुष्टि मिलती है और वह केवल सांस लेना ही नहीं बल्कि जीवन् को जीना सिखाती है ।
पत्रकार : क्या आपको लगता है कि आजकल अधिकांश गुरु सेलेब्रिटी (हस्तियों ) के गुरु ही बनकर रह गये हैं ?
गुरुमाँ - ऐसा कहा जा सकता है । लेकिन मुझसे से पूछो तो मुझे लगता है जो अपने जीवन को सेलेब्रेट करता है वही सेलेब्रिटी होता है ।
पत्रकार : क्या आपको लगता है कि राजनीति में धर्म का इस्तेमाल हो रहा है ?
गुरुमाँ - कुछ राजनेता अपने स्वार्थ के लिए धर्म के नाम पर लोगों को भड़काते हैं। धर्म आपको संस्कृति और मर्यादा प्रदान करता है जिससे राजनीति कोसों दूर रहती है ।
पत्रकार : एक आख़िरी सवाल, महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए आपकी परियोजना 'शक्ति' किस प्रकार काम कर रही है ? फीमेल फिटीसाइड को रोकने का प्रयास किस प्रकार जारी है ?
गुरुमाँ - आँकड़े बताते हैं कि 1947 से लेकर अब तक देश में करीब 3.5 करोड़ लड़कियाँ गायब हुई हैं । माना जा सकता है कि पुरुष प्रधान समाज ने उनकी बलि दे दी होगी । 'शक्ति' नारियों को उनका स्थान देने के लिए काम कर रही है। पिछड़े इलाक़ों में महिलाओं को साक्षरता उपलब्ध कराना सबसे बड़ा अभियान है । गत वर्ष करीब 225 युवतियों को आर्थिक मदद देकर उन्हे साक्षर बनाया गया ।
संमार्ग - महानगर (फ़रवरी 3, 2009), कोलकाता

प्रभु लगन

परमात्मा से दिल का प्यार
उस
प्रभु से मन की लगन
उस
दाते से दिल का भाव जुड़ जाना
दुनिया की सबसे बडी नेमत है
और सबसे बडी बरकत है
जो किसी इंसान को मिल सकती है
याद रखना इस बात को
आदमी की निगाह में संसार की बड़ी कीमत है.
लेकिन ज्ञानियों ने सदा इस संसार के रचनहार की
कीमत को, बड़ी कीमत आँका है
संसार की कीमत को नहीं
जगत की कीमत सिर्फ़ उतनी देर तक है
जब तक इस जगत की अधिष्ठाता,
इस जगत का आधार, इस जगत का अधिष्ठान,
वो सत्य चेतन आधार में है

--गुरुमाँ --

ऋषि अमृत मार्च 2001

सत्य की अनुभूति कब होगी ?


सत्य को पा लेना ही परमात्मा के प्रेम में जाग जाना हैं । यह कार्य दुर्लभ है । सत्य को पाने की राह करोड़ों लोग चलते हैं । पर कोई विरला ही इसे प्राप्त करता है , क्योंकि इस सत्य को पाने के लिए मानव जो कुछ भी कर रहा है सब उपर उपर से कर रहा है , मन से नहीं कर रहा है , प्राणों से नहीं कर रहा , आत्मा से नहीं कर रहा । मंदिर भी जाते , मस्ज़िद भी जाते , चर्च भी जाते , गुरुद्वारे भी जाते , तीर्थ भी जाते , पर हर जगह शरीर से । साधु संतों के आध्यात्मिक प्रवचनों में भी पहुँच कर कोई फ़र्क नहीं पड़ता है । क्योंकि आत्म निरीक्षण नहीं है , कोई चिंतन नहीं है , पीडाओं पर मंथन नहीं है , जीवन में कोई स्पन्दन नहीं है ।

मानव समाज को आधायात्मिक शक्ति प्रदान करने की कोई लालसा नहीं है । मन का क्लेश अगर ज्यों का त्यों रहेगा , तो लाख सवारो तन को , क्या होगा ? यदि हमने जीवन को नहीं सहलाया , किसी भूले भटके को सही राह पर नही चलाया , किसी गिरे को नहीं उठाया , फिर चाहे हम हर तीर्थ नहाएँ , मंदिर में नमन करें , क्या होगा ? सत्य की अनुभूति तो दूर , स्वयं को जानने समझने का विचार तक मन में नहीं आएगा ।

जीवन की बगिया सुरक्षित तब होगी , सत्य की अनुभूति तब होगी , जब भीतर बाहर एक ही स्वर चले , भीतर बाहर एक ही सुगंध उठे । सिर परमात्मा के श्रीचरणों में झुके । शरीर से किया गया हर जप तप , पूजा पाठ अंतर्मुखी होकर संसार रूपी परीधी से अपने केंद्र कि ओर आए ।

सत्य की अनुभूति तब होगी , जब वह जड़ से चेतन की यात्रा करे , स्थूल से सूक्ष्म का मार्ग ढूँढे , सीमित से निकल कर असीमित हो । क्योंकि जलने वाली आग भी अंतस में है , जलाने वाली लकड़ियाँ भी । दूसरों के हृदये में पवित्रता , प्रेम के बीज बो कर ही हम अंतर्मन में सत्य , प्रेम व करुणा के अंकुर प्रस्फुटित कर सकते हैं । तभी हम देह से उपर उठकर विदेह की स्थिति तक पहुँचेगे ।

ऋषि अमृत , मई 2006

ऋषिकेश साधना शिविर 2008


२५ दिसम्बर २००८ शाम के चार बजे। गंगा किनारे वानप्रस्थ आश्रम मैं हर साल की तरह शिविर की शुरुआत हुई। गुरूजी ने सेवा के ऊपर ज़ोर देते हुए एक सुंदर भजन गाया, सखी री संत सेवा करी आई। फिर यम् और नियम की चर्चा करते हुए बात सत्य और अहिंसा की तरफ़ बात चली। गुरूजी ने एक शिष्य के कर्तव्यों मैं सत्य और अहिंसा को प्राथमिकता दी। शिष्यों की क्या जिम्मेदारियां हैं उसपर भी बल दिया। उन्होंने उपस्थित श्रोताओं से यह प्रश्न पुछा की आप क्या सुबह चार बजे जग जाते हो। योग, प्राणायाम और ध्यान करते हो? अगर नियम से ऐसा नहीं हो पाता, तो आप सच्चे साधक कहलाने के योग्य नहीं हो।
सब साधकों को रोजाना आध्यात्मिक दिनचर्या लिखने का निर्देश मिला गुरूजी से। कितने बजे उठे, कितने घंटे योग, ध्यान और जप किया। शाम को योग निद्रा किया की नहीं। पूज्य गुरूमा ने साधकों से २४ घंटों के एक दिन मैं से दशम अंश यानि की ढाई घंटे प्रभु को अर्पण करने को कहा। तन, मन और धन से प्रभु के हो जाओ। मन से ध्यान, योग, जप और प्रभु की याद करो(भजन)। तन से गुरु की और प्रभु की यानि समाज मैं जो ज़रूरतमंद लोग हैं, उनकी सेवा करो। धन का दशम भाग गुरु को अर्पित करो या किसी भी सामाजिक कार्य लगाओ। यहीं गुरूजी का संदेश रहा इस शिविर मैं।
गुरूजी ने उपस्थित साधकों से लिख के देने के लिए कहा की क्या वे ये सब कर रहे हैं की नहीं। लिखित उत्तर पाने के बाद गुरूजी इस नतीज़े पर पहुंचे की अधिकांश साधक बेईमान हैं, साधना ठीक से नहीं कर रहे। गुरूजी ने एक उदहारण दिया जिसमे की एक संत प्रवचन कर रहे थे। प्रवचन के बाद उन्होंने साधकों से पूछा की उन्हे क्या समझ आई। पर वे उत्तर न दे सके क्योंकि वे सब बहरे और गूंगे थे। गुरूजी ने कहा की तुम लोगों का भी यही हाल है। मैं सालों से बता रही हूँ की कैसे जीवन जीओ, पर तुम ये बिना सोचे की फिर नर तन मिलेगा की नहीं, बेहोशी से जियें जा रहे हो, बिना नियम, बिना बंधन, बिना साधना करे, जीवन यापन कर रहे हो।
गुरूजी ने कई साधकों के पत्रों का भी उत्तर दिया। भय और क्रोध की भी चर्चा हुई। किस तरह से इनसे छुटकारा पाया जाए। किस तरह से शवास लेनी चाहिए, इसका खुलासा गुरूजी ने किया। 'शवासों का विज्ञान' ध्यान की विधि सिखाई गई। उर्जा ध्यान और प्रणव ध्यान का भी अभ्यास किया गया। रोज़ सुबह गुरु जी के साथ बैठक शुरू होने से पहले योगा होता होने के पहले योगा अभ्यास किया जाता ।

११ बजे योग निद्रा का अभ्यास किया जाता । सभी साधकों ने गंगा के किनारे बैठ कर भी ध्यान का आनंद लिया ।

जय गुरुदेव, ऐसी करी गुरुदेव कृपा, मेरे मोह का बंधन तोड़ दिया ।

सीमा मिश्रा , कोलकात्ता

मुक्ति

अक्सर लोग पूछते हैं -" जिसका पुत्र न हो तो उसका दाह संस्कार कौन करेगा ? और दाह संस्कार न होगा तो जीव को गति कैसे होगी ?" पुत्र तो होना जरुरी है ।

कर्म कांड और शास्त्र की दृष्टि से देखते हो और तुम क्या मानते हो मैं ( गुरुमाँ ) ये नहीं जानती , पर हकीकत और यथार्थ की बात कह रही हूँ और यथार्थ यह है की हर जीव अपनी सदगति ख़ुद अपने शुभ कर्मों से करता है । किसी लड़के के दाह संस्कार करने पर तुम्हारी गति नहीं होने वाली । अगर पुत्रों के दाह संस्कार करने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती तो जो संन्यासी जिनके पुत्र कोई नहीं , आजीवन ब्रह्मचारी रहे वो तो बेचारे नर्को में ही रहेंगें क्योंकि उनके तो कोई लड़का ही नहीं ।

लोग ये सोचते हैं की एक आदमी मर गया तो उसके मरने के बाद अगर हम उसके नाम पर दान , तप करते हैं तो उसको अच्छी जगह मिल जायेगी स्वर्ग में । मैं कह देना चाहती हूँ आप स्वर्ग में होंगे कि नर्क में होंगे उसका दारोमदार ख़ुद आपके ऊपर है न कि किसी ऐसे गैरे नत्थु खैरे के दो चार मंत्रों के पड़ लेने पर तुम स्वर्ग में नहीं पहुँच जाओगे । मेरे बात कड़वी लगेगी बहुत लोगों को , पर सच तो यही है।

कबीर साहब सारी जिन्दगी बनारस में रहे हैं , सारी जिन्दगी गंगा किनारे बिताई , और लड़ते रहे लड़ाई अज्ञान और ज्ञान की उस समय के तथाकथित पंडितों और मौलवियों के साथ । क्योंकि कबीर की बात किसी के गले नहीं उतरने वाली थी । जब कबीर की बात किसी के गले नहीं उतरती थी । तब कबीर ये कहते -

" अवल्ल ल्लाह नूर उपाया ,
कुदरत के सब बन्दे
एक नूर ते सब जग उपजाया ,
कौन भले कौन मंदे
लोगा भरम भूलो भाई ,
खालक खल
खलक में खालक पूर रहो सब थाईं
कबीर मेरे शंका नासी ,
मैं आकुल निरंजन डीठा "

आकुल निरंजन देखता हूँ सब में । एक उसी अल्लाह से सबकी पैदाइश हुई है । एक ही नूर की हम सब किरणें हैं । एक ही मिट्टी के हम सब बर्तन हैं । एक माटी से निकले हैं । कौन हिन्दु ? कौन मुस्लिम ? कौन ऊँचा ? कौन निचा ? पर कबीर की ये बात किसी के गले नहीं उतरती । लोग दुश्मन हो गए कबीर के , लोग लड़ने मरने पर उतारू हो गए । पर कबीर अडिग रहे बनारस में । पर जब उनकी उमर काफ़ी ज्यादा हो गई , जब मरने का समय नजदीक आने पर कबीर ने कहा अपने शिष्यों से , अब मुझको तुम मघहर ले चलो । अब मैं मघहर में जाकर मरूँगा ।

सब लोग बड़े हैरान । दूर-दूर से लोग मरने के लिए बनारस आते हैं,कांशी आते हैं । आप सारी जिन्दगी काशी रहे और अब जब मरने की घड़ी आई है तो मघहर में ! क्या आप जानते हैं मघहर को श्राप है ? ऐसे कहानी है , दंत कथा है ऐसे कि जो मघहर में मरता है वो गधा होता है ।

कबीर कहते , " मैं जाऊँगा तो मघहर ही जाऊंगा । मरूँगा तो मघहर में ही मरूँगा । "

उन्होंने पूछा - "क्यों ? काशी में क्यों नहीं ? "

कबीर ने बड़ा अनमोल वचन दिया । और मैं कहूँगी - इतनी जुर्रत जो है वो किसी खाली दिमागदार विद्वान , किसी किताबों के ज्ञाता , किसी शास्त्री के भीतर .................. । सोच भी नहीं सकता वो कभी स्वप्न में जो कबीर ने बात कही ।

कबीर ने कहा - अगर मैं काशी में मरूँगा तो कहने वाले कहेंगे कि कबीर मुक्त हुआ चूँकि काशी में मरा पर मैं जानता हूँ , कबीर मुक्त हुआ गुरु के वचन से ईशवर ही कृपा से , न कि खाली काशी में मर जाने से । इसलिये मैं मघहर में मरूँगा ताकि देख ले दुनिया कि मुक्ति के लिए बनारस में मरना जरुरी नहीं। अगर तुम मुक्त पुरूष हो ........ ।

पंचद्शीकर में , स्वामी विद्यानंद जी ने लिखा है - " कि ब्रह्मचारी हाय हाय करता हुआ भी मरे तो वो जीवन मुक्त है । ब्रह्मज्ञानी रोते हुए शरीर के कष्ट में भी हाय हाय करता मरे तो भी उसकी अधोगति नहीं होती , तो भी वो अपने स्वरूप में ही स्थित रहता है । "

कबीर ने कहा , " मैं नहीं मरूँगा बनारस में इसलिए कि बनारस के लोग जान लें और कुल दुनिया भी समझ ले कि आदमी कि सदगति होगी तो वो साधना से , गुरु की कृपा से , ईशवर कि कृपा से , ईशवर के प्रताप से , नाकि बनारस में जाकर मरने से और न ही पुत्र द्वारां ही अग्नि देने से । इसलिये हे बन्दे अगर मुक्ति चाहिए तो अच्छे कर्म कर ,साधना के मार्ग पर चल,गुरु कि कृपा का पात्र बन ।

अकेलेपन की खुशी

सुहावने इस मौसम में
जब भी सदगुरु तेरी याद आती है
मेरे इस नाजुक दिल की
धड़कन सी रुक जाती है
ऐसा लगता है कि
शायद यह कुछ बतलाती है
तभी तो बिन मौसम के
बरसात चली आती है
सुंदर से संगीत में
तेरे चलने की आहट आती है
जब पलट के देखते हैं
तो हवा की सनसनाहट सुन जाती है
अकेलेपन की यह खुशी
पल - पल तुमसे मिलाती है
होंठो पर हर पल चुप्पी सी छा जाती है
दिल में तेरे नाम की धुन सुना जाती है
जब भी सतगुरु तेरी याद आती है
बिन बादल बरसात चली आती है

संकल्प



" झर रहा संगीत है मौन के आकाश में
बिना छुए हर वाद्य बजता स्वयं के विश्वास से "
ध्यान की परम स्थिति यह है जहाँ विचार पूरी तरह से चले जाते हैं कुछ लोगों ने लिखा कि हमसे तो ध्यान हो ही नही रहा , मन में बहुत विचार आते हैं , उसके कारण बहुत दुःख होता हैइतनी मुश्किल से आए हैं यहाँ पर,लेकिन यहाँ आकर के भी ध्यान नहीं कर पा रहे

अब समझिये इस बात को ! पूर्ण निर्विकल्पता इतनी सहजता से नहीं होती ! एक दिन में ध्यान को सीख के तुम कहो कि में निर्विकल्पता में पहुँच जाऊँ , तो यह तुम्हारा दिवा स्वप्न ही रह जाएगा मन में हज़ारों नहीं , लाखों नहीं, करोड़ों संस्कार पड़े हुए हैं इसी जन्म के नहीं जन्मों जन्मों के संस्कार हैं , वासनाएं हैं, इच्छाएं हैं

तुम्हारे मन में चार या पाँच दिन के नहीं , चार या पाँच सालों के भी नहीं और चार या पाँच जन्मों के भी नहीं , लाखों जन्मों के संस्कार हैं, तुम्हारे सोचे हुए सारे विचार हैं एक दिन का नहीं यह मामला ! ध्यान में जब आप उतरें , इन बातों का ख़याल रहे - एक , मन कि स्थिति यही है ध्यान में जब विचार आते हैं , तो विचार से कभी भी लड़ें नहीं कि ये क्यों रहा विचार !

मैंने ये कभी नहीं कहा कि आँख बंद करते ही हो गया ध्यान शुरू सिद्ध संतों का ऐसे होता है उनको कुछ करना नहीं पड़ता आँख खुली रहे कि बंद , उनका मन हमेशा शांत ही रहता है लेकिन एक नये आदमी के लिये मैंने जो ध्यान विधियां दी हैं , उनके साथ बैठे , तो लाभकारी होगा

जब आप ध्यान की किसी भी विधि को सौ प्रतिशत ईमानदारी के साथ करते हैं , तो विचार के आने के लिए जगह ही नहीं बचाती ! जब आप मेरी बताई हुई क्रिया को ठीक तरह से नहीं करते हो या आधे मन से करते तो भी विचार आते हैं पूरी - पूरी अटेंशन उस ध्यान विधि को अगर आप देंगे , तो विचार बहुत कम हो जाते हैं

अब आम तौर पर अगर तुम कुछ कर रहे हो और ऐसे ही बैठे हो खाली हो करके , तो शायद एक घंटे में तुम्हारे मन में हजारों विचार आते होंगे आपको पता भी नहीं चलता होगा लेकिन जहाँ तुम ध्यान करने के लिए बैठ जाते हो , तो वे हजारों विचार कुछ सौ तक ही सीमित रह जाते हैं अब यह उपलब्धि हुई की नहीं , बताओ !

जो अभी कई सौ विचार रहे हैं , वो फ़िर कुछ अंकों में गिने जाने योग्य ही आने लगेंगे और फ़िर और कम हो जायेंगे विचार एक दम से तो नहीं चले जाते एक ही दिन में निर्विकल्पता नही मिलती एक ही दिन जाए बच्चा स्कूल और कहे ' मुझको एम् . की डिग्री दे दो ' , तो ये एक दिन में थोड़े डिग्री मिलती है ! सोलह साल जाता रहता है स्कूल कालेज में , इम्तेहान देता है , तब जाके डिग्री मिलती है

विचार आएँ , तो विचारों के प्रति उपेक्षा का भावः रहे उपेक्षा मतलब , मुझे उन विचारों से कोई मतलब नहीं है विचार रहे कि जाए विचारों को उपेक्षा के भावः से देखो जैसे , एक विचार आया कि ' आज ठण्ड लग रही है ' : अब , अगर तुम इस विचार को पकड़ लोगे , तो फ़िर उस विचार के साथ और कई विचार आयेंगे जैसे ' ये दिन ही सर्दी के हैं पता रहता थोड़ा तो और गर्म कपड़े पहन लेते सर्दी में गर्म चीज खानी चाहिए '

ख़याल करना , ध्यान के लिये बैठे थे सिर्फ़ एक विचार आया था कि ' ठण्ड लग रही है ' अब , ठण्ड है तो लगेगी ही ! अगर तुमने उस पहले विचार के साथ ही नाता रखा : क्योंकि 'तुम' तो मन और मन के विचारों से जुदा हो , अलग हो तो तुम अगर अपने अलग पने के भावः में रहे और पहले विचार को अटेंशन का पानी दिया , तो वह विचार लुप्त हो जाएगा

विचार उठा कि 'ठण्ड लग रही है ' , तो ज्यादा से ज्यादा दूसरा विचार यह आएगा कि ' शरीर को ठण्ड लग रही है ' बस ! वहीं विचार लुप्त हो जाता है सर्दी गर्मी को सहन करना भी तो साधना का ही हिस्सा होता है

तो आँख बंद करके बैठे तुम और विचार उठने लगे कि ' सर्दी लग रही है ' , तो अब अगर तुमने तुंरत संकल्प किया कि ,लग रही है ठण्ड तो क्या , शरीर को लग रही है ! सर्दी गर्मी बर्दाश्त करना है ' , तो उस संकल्प में इतना बल होता है कि एक बार आप संकल्प कर लो , तो फ़िर जीरो डिग्री में भी तुमको बिठा दिया जाए , तो वहां भी ठण्ड नहीं लगेगी तुमको

आपके मन में संकल्प कि शक्ति किसी बहाने बन जाए , बस फ़िर कोई अड़चन सामने आएगी नहीं ! तुम गए देवी माता के मन्दिर , तुमने प्रणाम किया फिर कहते हो कि ' इस देवी माँ में बड़ी ताकत है इस ताकत से मेरा बिगड़ा काम सँवरेगा ! ' अब ' मेरा काम सँवरेगा , सँवरेगा ' , बार - बार यही विचार करते - करते वह काम सँवरने का संकल्प गहरा हो जाता है बस ! तुम्हारा काम हो गया !

तुमने कहा 'देवी की कृपा से काम हो गया' मैं ( गुरुमाँ ) कहती हूँ , किसी की वजह से नहीं ! तुम्हारे अपने संकल्प की शक्ति से ही काम होता है पर तुमको अपने ऊपर कोई श्रद्धा नहीं , तुम समझते हो कि ' मैं तो परमात्मा से जुदा हूँ '

संकल्प ! जब तुम संकल्प करते हो , तो उस संकल्प के साथ 'निश्चयकर अपनी जीत करो' ! किसकी विजय होती है ? निश्चये कि ! निश्चय हो तो , तो हार ही हार है ! संकल्पपूर्वक और ईमानदारी से आप ध्यान में बैठो , तो आप अपने भीतर की स्थिति पा सकते हो सौ प्रतिशत विचार तो नहीं चले जायेंगे , लेकिन कम , बहुत कम हो जाते हैं जैसे - जैसे आप संकल्प से अपने भीतर उतरने लगते हैं , वैसे - वैसे ध्यान गहरा और विचार कम , और कम होते जाते हैं,

स्त्री शक्ति



स्त्री शक्ति है, देवी है, पूजनीय है ऐसा तो सभी मानते है। परन्तु पुरुषों द्वारा दिए इन् विशेषणों में साथ ही कुछ अजीब शर्तें भे रख दी हैं। जैसे, स्त्री पुरूष के अधीन रहे। पहले पिता के अधीन, फ़िर पति के अधीन और अगर पति जीवित रहे , तो विधवा हो जाने के बाद पुत्रों के अधीन रहे। अगर उसके पुत्र हो, तो भाइयों के सहारे रहे।

और अगर स्त्री इन बन्धनों को स्वीकार करे तो फ़िर समाज और धर्म के ठेकेदार उसे कुलटा, पतिता और वेश्या तक का नाम देते भी घबराते नही। स्त्री अगर पुरुषों द्वारा रचे हुए शास्त्रों के नियमो में बंधी रहे, तो एक बंधित पशु की भांति कुछ दूर टहलने के लिये ही सिर्फ़ जरा सी रस्सी ढीली कर दी जाती है।

ऐसा करने के कारण पूछें , तो कहे जाते हैं एक , स्त्री की बुद्धि नही होती और हो भी तो कम होती है दूसरा , स्री बहुत चंचल होती है , इसलिए उस पर अधिक भरोसा नही किया जाता। तीसरा, स्त्री कमजोर हृदय की होती है, इसलिए जल्दी भावुक हो जाती है और फ़िर भाव में कुछ भी ग़लत कर बैठती है। चौथा कारण , स्त्री के शरीर की रचना ऐसी है कि वह बलात्कार की शिकार हो सकती है और उसका मासिक धर्म उसे कमजोर, चिडचिडा और रोगी बना देता है।

इसलिए स्त्री सदेव पुरुषों की आश्रित होकर रहे पुरूष ही उसकी , सुरक्षा और भरण पोषण कर सकता है इन् तर्कों में कितनी सच्चाई है , आइये थोड़ा इस पर चिंतन करें!

पहला तर्क कि स्त्री में बुद्धि नहीं होती। अगर स्त्री में बुद्धि नहीं होती, तो फ़िर उससे जन्मे हुए पुत्रों में बुद्धि कि कमी दिखनी चाहिए। यह कैसे सम्भव है कि माता तो बुद्धि से कमजोर है परन्तु पुत्र अक्लमंद पैदा हुआ हो और फिर उसी माता से जन्मी पुत्री तो उसके जैसी कम बुद्धि वाली हो ? माता में बुद्धि कि कमी मानी जाए, तो इसका मतलब ऐसा कहने वाले तमाम स्त्री जाती को ही अपमानित कर रहें हैं

माँ गार्गी ,महान मदालसा, मैत्रेयी, इन स्त्रियों को आप क्या किसी भी ऋषि, महाऋषि से कम कह सकेंगे! मदालसा जैसी स्त्रियों की बात तो क्या ही कहनी! जो ख़ुद तो बुद्धिमान है ही, आगे से ख़ुद ही सदगुरु की भांति अपने सात-सात पुत्रों को ज्ञान का उपदेश देती है।

योगावासिष्ठ में ज़िक्र आया है रानी चुडाला का , जो अपने पति राजा शिखरध्वज को ज्ञान देती है। वह बात अलग है कि पत्नी कि बात वह मानेगा नहीं , ऐसा देख करके उसे उपदेश देने के लिये योग शक्ति द्वारा उसे पुरूष का रूप लेना पड़ा। ज्ञान देने के बाद ही अपना वास्तविक रूप उसने अपने पति को दिखाया कि यह कोई मुनि महात्मा नहीं, स्वयं उसकी पत्नी चुडाला है

महाप्रतापी शिवाजी के राजनीतिक जीवन की सूत्रधार और प्रेरक उनकी माता जीजाबाई थी। और युद्ध कौशल में निपुण झाँसी की रानी, रजिया , गुरु गोविन्द सिंह कि खालसा फौज में माई भागो अपने बुद्धि बल और युद्ध कौशल के कारण सेना की नायिका बनी।

इंदिरा गाँधी, मार्गारिट थेचर ये आज की राजनीतिज्ञ महिलाएं ! क्या बिना बुद्धि के ये सभी राजनीति में कार्य कर पातीं ! ज्यादा क्या कहना ! विद्या की देवी माँ सरस्वती मानी जाती है तो बिना बुद्धि के ही विद्या की देवी कहलाती है ? तो कोई कैसे कह सकता है कि स्त्रियों में बुद्धि की कमी है ?

दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि स्त्री चंचल होती है चंचलता और ठहराव तो मन का स्वभाव है। शरीर से उसका क्या लेना देना ! मन में रजोगुण अधिक हो, तो पुरुष और स्त्री दोनों ही उच्चश्रंखल हो जायेंगे। मन में सत्वगुण अधिक हो तो, दोनों ही शांत , गंभीर , ठहरे मन वाले होंगे। मन की शान्ति - अशांति, चंचलता - ठहराव का सम्बन्ध इंसान की बुद्धि से, गुण, व्यवहार कुशलता और चेतना से है , ना की शरीर से !

ध्यान की गहराईयों को दोनों ही समान रूप से छू सकते हैं मन की सौम्यता , एकाग्रता पर किसी पुरूष या स्त्री किसी जाती का प्रभाव नहीं है। इच्छा और वासना मन में हो , तो मन चंचल होगा ही ! फिर वह मन चाहे स्त्री का हो या पुरूष का!

तीसरा तर्क दिया जाता है कि स्त्री हृदय प्रधान होती है भावना में बह जाती है तो यह गुण हुआ, कि अवगुण! भाव विहीन इंसान तो जड़ है,पत्थर है,संवेदनहीन है कोई कवि तब तक कवि नहीं बन सकता ,जब तक उसका हृदय भावना और संवेदना से भरा हो

वही बात मूर्तिकार , शिल्पकार, गायक, नर्तक पर भी लागू होती है भावना, संवेदना इंसान को उभारती है यही भावना श्रद्धा से भरपूर हो जाए , तो परमात्मा के प्रति प्रेम में बदल जाती है। यही भावना उसके लिये भक्ति कि सीढ़ी सिद्ध होती है। भक्ति मार्ग पर चलने के लिये महँ संवेदनशीलता चाहिए। भाव विहीन इंसान क्या भक्त हो सकेगा और क्या प्रभु को प्राप्त कर सकेगा !

चौथा तर्क दिया जाता है कि स्त्री का शरीर ऐसा है कि हर माह मासिक धर्म के कारण वह रोगी कमजोर और चिडचिडी हो जाती है कई पुरूष रचित शास्त्र रजस्वला स्त्री को अपवित्र मानते हैं इस्सी के आधार पर कथावाचक और पंडित स्त्री प्रहार करते है कि स्त्री ' ' नहीं बोल सकती, स्त्री पूजा - पाठ नहीं कर सकती ! और उसको उन दिनों दर्शन भी नहीं करना चाहिए !

अब सवाल यह उठता है कि क्या यह पुरूष कथावाचक जानते हैं कि स्त्री को मासिक धर्म आए , तो स्त्री जरुरत और समय अनुसार गर्भवती नहीं हो सकती ! अगर स्त्री गर्भवती नहीं हो सकेगी, तो उनके जैसे पुत्रों को जन्म भी नहीं दे सकेगी।

मासिक धर्म कुदरत द्वारा दी गई स्त्री शरीर कि व्यवस्था है , जिससे लड़की एक दिन माँ हो पाति है। कुदरत कि इस व्यवस्था कि निंदा करना और उसी कारण स्त्री को भी अपवित्र , अदर्शनीय कहना , यह क्या सही है ?

यहाँ तक भी कहा जाता है कि मासिक धर्म में स्त्री भजन नहीं करे सवाल यह उठता है कि पूजा - पाठ तो दिल से किया जाता है सुमिरन , भजन , जप , दिल से किया हो , तो ही सही माना जाता है नहीं तो , हाथ में तो माला घूम रही है और मन ? मन संसार में भटकता है ! क्या इसे भजन कहा जा सकता है ?

भगवदगीता कहती है: अंत में जैसी मति होती है , वैसी ही मानव कि गति होती है और मृत्यु का क्या ! वह तो कभी भी सकती है ! तो क्या रजस्वला स्त्री मृत्यु के समय पर भी भजन - पूजा करे ? हर शवास को हरी भजन में लगाना तो सभी के लिये श्रेयस्कर है , चाहे स्त्री हो या पुरूष !

आज के आधुनिक समय में स्त्री हर जगह में सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। चाहे वह शिक्षा का हो , सरकारी नौकरी का हो अथवा पुलिस या सेना में या ख़ुद का व्यवसाय हो ! हर जगह स्त्री पूरी कुशलता से पुरुषों जैसा अक्षुण काम कर रही है।

जिन्होंने शास्त्र रचे वे भी पुरूष , जिन्होंने समाज के नियम बनाये वे भी पुरूष , जो कथावाचन करता है वह भी पुरूष ! तो ये पुरुषों ने बनाई हुई सभी धारणाओं के जरिये वे अपने अहम् को ही पुष्ट करते रहते है जैसे, पुरूष बुद्धिमान है और स्त्री कम बुद्धि की ! पुरूष भावुकता में बह नहीं जाते और स्त्री तो सदा ही भावना में बह जाती है पुरूष चंचल नहीं होते , स्त्री तो बड़े चंचल मन की होती है। पुरूष के शरीर की रचना सदा उसे स्वस्थ बनाये रखती है और शक्तिपूर्ण बनाये रखती है , स्त्री का मासिक धर्म और उसके शरीर की रचना उसको कमजोर बनाये रखती है।

अब, स्त्रियाँ सदियों से इन सबी तर्कों को सुनते - सुनते इतनी प्रभावित हो गई है की उन्ही को सत्य मानने लगी हैं।
पर मेरा निवेदन है की जरा खुले दिल से इस पर विचार करें , चिंतन करें और सालों की इस भ्रमित , कुटिल और निंदास्पद कुरीतियों से मुक्त होकर खुले आकाश में साँस लें ! स्त्री कमजोर है , नीच है , अपवित्र है , ऐसा कभी भी ना माने !

स्त्री तो शक्ति है , जगदम्बा है , माँ है , हर अवस्था में महान है आज की जरुरत यह है की लड़कों की भांति लड़कियों को भी उच्च शिक्षा , उचित खान - पान और ज्ञानप्राप्ति के मोके उपलब्ध कराये जाएँ , जिससे लड़की शरीर और मन से स्वस्थ , पुष्ट होकर समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को सफलतापूर्वक निभा सके।

" माँ तू पूजनीय है ! जननी है तू शक्ति है !
तू पूर्ण की ही अंश है ! हे माँ ! तू पूर्ण है !"